बच्चों को वर्णमाला कैसे सिखाएं?
बच्चो को वर्णमाला कैसे सिखायें
बच्चों को वर्णमाला कैसे सिखाएं? इस तरह के सवाल से एक बात तो साफ-साफ समझ में आती है कि आप बच्चों को वर्णमाला रटाना नहीं चाहते हैं। आप चाहते हैं कि बच्चों को वर्णमाला की समझ हो और वे उसका इस्तेमाल कर सकें।
इस सिलसिले में सबसे पहली गुजारिश यही होगी कि आप बच्चे को पूरी की पूरी वर्णमाला रटाने की कोशिश न करें। अगर आप ऐसा करते हैं तो आप पाएंगे कि बच्चा कुछ समय बाद पूरी वर्णमाला भूल जाएगा। हो सकता है कि उसे कुछ वर्ण याद रह जाएं। इसके बाद आपकी प्रतिक्रिया होगी, “मैंने बड़ी मेहनत से बच्चों को वर्णमाला सिखाई थी, देखो छुट्टियों के बाद वे सब भूल गये।”
वर्णों की आवाज़ और बनावट
ऐसा करना बच्चे को कोरा कागज मानने की तरफ संकेत करता है। बच्चे खुद से भी सीखते हैं। अपनी अवधारणाएं बनाते हैं। वे जिन चीज़ों को खुद समझते हैं, उसे वे भूलते नहीं। इसलिए बेहतर होगी कि आप बच्चों को वर्णों के साथ एक सार्थक रिश्ता बनाने का मौका दें।
वर्णों की पहचान से बच्चे को पढ़ना-लिखना सिखाना चाहते हैं तो इसके लिए आप एक-एक वर्ण की आकृति, उसकी आवाज़, उससे बनने वाले शब्दों से शुरुआत कर सकते हैं। जैसे किसी शब्द की पहली आवाज़ क्या है? उस आवाज़ को आप वर्ण के रूप में बच्चों के सामने रख सकते हैं। किसी शब्द में आने वाला पहला वर्ण और पहली आवाज़ का रिश्ता जब बच्चे धीरे-धीरे समझने लगेंगे तो आपका काम आसान हो जाएगा। बच्चे वर्ण पहचानने लगेंगे।
शब्दों में इस्तेमाल का अवसर
मगर यह काम धीरे-धीरे होना चाहिए। हड़बड़ी में नहीं। शुरुआत ऐसे वर्णों से करें जो बार-बार इस्तेमाल होते हैं। ऐसे कई वर्ण सिखाने के बाद आप उनको आपस में जोड़कर शब्द बनाना और शब्दों को पढ़ना बच्चों को सिखा सकते हैं।
जैसे आ और म। के बाद आम पर आ सकते हैं। आ और ए सिखाने के बाद ‘आए’ की बात कर सकते हैं। ग, र और म सिखाने के बाद ‘गरम’ जैसे शब्द पर आ सकते हैं। चित्रों का इस्तेमाल जरूर करें।
इससे आप आम को देखकर जैसे बच्चे आम बोलते हैं, आम शब्द को भी उसी रूप में पढ़ने की दिशा में बच्चों को आगे ले जा सकते हैं। ध्यान रहे कि ‘आ’ को ‘आ’ ही पढ़ा जाये, वह आम न हो जाये। क्योंकि आम से बच्चों का पुराना परिचय है, वह पहले याद हो जायेगा और ‘आ’ का नंबर उसके बाद आयेगा।
इसके अलावा निरर्थक शब्दों से भी बच्चों को पढ़ने और वर्णों की पहचान हो रही है या नहीं इसकी जाँच कर सकते हैं। क्योंकि ऐसे शब्दों को रटना संभव नहीं होता है। इससे बच्चों ने जिन वर्णों को सीखा है, उनकी समझ और ज्यादा पुख्ता हो जाएगी।
मात्राओं की शुरुआत
शब्द पठन के साथ-साथ मात्राओं के साथ भी बच्चों को परिचित कराया जा सकता है। इसके लिए एक बात का विशेष ध्यान रखना होगा कि बच्चा मात्राओं के प्रतीकों के साथ-साथ उसकी आवाज़ से परिचित हो और मात्राओं के लगने से किसी वर्ण की आवाज़ में क्या बदलाव होता है इस बात को समझ पाये।
इसके लिए मात्रा के प्रतीक और उसकी ध्वनि से परिचित कराना चाहिए। उसके बाद वर्णों में मात्रा लगाने से उसकी आवाज़ में क्या बदलाव होता है? किसी शब्दांश को पढ़कर यह बताया जा सकता है। जैसे ‘क’ में //ई// की मात्रा लगने के बाद ‘की’ पढ़ा जाता है। ‘र’ में //ई// की मात्रा लगने से ‘र’ को ‘री’ पढ़ा जाता है। यह बात बच्चे को समझने का मौका देना चाहिए।
इसके साथ ही वर्ण से मात्रा मिटाकर पढ़ने का मौका दिया जा सकता है। इससे बच्चे को मात्राओं का कांसेप्ट समझ में आता है और उसे बारहखड़ी रटने की जरूरत नहीं होती। उसके पढ़ने की रफ्तार भी उन बच्चों की तुलना में अच्छी होती है, जिन्होंने बारहखड़ी को पहाड़े की तरह याद कर लिया है।
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हिंदी में मात्राएं सिखाते समय रखें इन बातों का ध्यान
हिंदी भाषा में मात्राओं का शिक्षण कराते समय सबसे बुनियादी बात है कि एक दिन में एक नई मात्रा सिखाएं। इससे उनको अपनी समझ पुख्ता करने में मदद मिलती है। उदाहरण के तौर पर अगर आपने बच्चों को ऋ वर्ण की मात्रा का प्रतीक बताया कि /ऋ/ वर्ण का प्रतीक है / ृ/। भाषा कालांश में मात्रा के लगने के बाद वर्णों के प्रतीक और आवाज़ में क्या बदलाव होता है, इसे भी स्पष्ट करें।
मात्रा लगने से क्या बदलाव होता है
किसी वर्ण में मात्रा लगने के बाद उसका प्रतीक और आवाज़ बदल जाती है। इस बात को बच्चों के सामने उदाहरणों के माध्यम से स्पष्ट करें। क+ ृ= कृ (कृपा), ग+ ृ= गृ (गृह), म+ ृ= मृ (मृग), घ+ ृ= घृ (घृणा), क+ ृ= कृ (कृपा), न+ ृ= नृ (नृत्य)
शब्द के किसी वर्ण में मात्रा लगने से उसका अर्थ भी बदल जाता है। जैसे मग शब्द में म के साथ ऋ की मात्रा (ृ) आने पर यह शब्द मृग हो जाता है। इस बात को उदाहरणों के माध्यम से बच्चों के साामने रखा जा सकता है।
ध्यान रखने वाली बात
बच्चों को नई मात्रा ऐसे वर्णों के साथ सिखाएं जिसे वे पहले से जानते हों। यह भी ध्यान रखें कि जो मात्रा हम सिखाना चाहते हैं उसके वर्ण प्रतीक और मात्रा प्रतीक को बच्चे पहचानते हों। हमें नई मात्रा सिखाने के बाद दो-तीन दिन तक बच्चों को उसके अभ्यास का मौका देना चाहिए। साथ ही साथ मात्रा से बनने वाले शब्दों के पढ़ने का अवसर देकर बच्चों की समझ को पुख्ता बनाया जा सकता है।
एक उदाहरण
अब हम नीचे ऋ की मात्रा और उसके प्रयोग का उदाहरण देखते हैं। ऋ की मात्रा का अभ्यास लिखित रूप में करवाने के लिए हम बच्चों को उपरोक्त शब्द मात्रा हटाकर दे सकते हैं। ताकि बच्चे मात्रा जोड़कर उस शब्द को लिखने का अभ्यास कर सकें। उदाहरण के लिए वक्ष, मग, गह, पथ्वी, नत्य, नप, कप इत्यादि। इन सभी शब्दों में पहले ही वर्ण में मात्रा लग रही है। इसलिए इस अभ्यास को करना उनके लिए तुलनात्मक रूप से आसान होगा, अगर यही मात्रा शब्द के बीच वाले अक्षर या आखिरी अक्षर के साथ आती।
बच्चों के प्रयास के बाद उनको सही प्रयोग बता सकते हैं। इस तरह से होने वाला अभ्यास बच्चों को आत्मविश्नास को मजबूती देगा।
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हिंदी शिक्षणः क्यों होती है मात्राओं की ग़लती?
"हिंदी भाषा में शुद्ध-शुद्ध लिखना बहुत से लोगों को नहीं आता।" बहुत से शिक्षक और प्रोफ़ेसर इस शुद्धता की वकालत करते दिखायी देते हैं। हिंदी भाषा का प्राथमिक स्तर पर जैसा शिक्षण होता है। पढ़ने की आदत का विकास करने के प्रति जैसी उदासीनता दिखाई जाती है। उसका भी कुछ असर हिंदी लिखने-पढ़ने-समझने की क्षमता पर पड़ता है। इस पोस्ट में पढ़िए कैसे हिंदी बोलने और लिखने के बीच का फ़ासला मात्राओं की ग़लतियों के रूप में सामने आता है। और न पढ़ने की आदत से यह स्थिति सालों साल बनी रहती है। उसमें कोई बदलाव नहीं होता।

हिंदी भाषा में वर्णों और मात्राओं का आपसी तालमेल समझना मात्राओं की ग़लती से बचने का सबसे अचूक उपाय माना जाता है।
हिंदी लिखने के दौरान मात्राओं की ग़लती बहुत से लोगों से होती है। मुझसे भी होती है। इसे सुधारने का क्या फॉर्मूला हो सकता है? बहुत से लोग यह सवाल पूछते हैं। मगर इसका कोई एक निश्चित जवाब नहीं है। हर किसी से हिंदी भाषा में लिखते हुए अलग-अलग तरह के मात्राओं की ग़लती होती है, उसे सुधारने के लिए उसी के अनुरूप ही कोई सुझाव दिया जा सकता है।
आमतौर पर हिंदी के बारे में दावा किया जाता है और ऐसा कहा जाता है कि यह जैसी बोली जाती है। वैसी ही लिखी जाती है। मगर लंबे समय बाद जबसे यह वाक्य पता चला है, अब जाकर इसकी एक सच्चाई पता चली है कि हिंदी बोली तो स्थानीय संस्कृति और परिवेश के अनुरूप है। जिसके ऊपर आसपास की भाषाओं और बोलियों का व्यापक प्रभाव होता है। मगर वह लिखी केवल अपने मानक रूप में जाती है।
लिखित में तो मानक रूप ही चलता है
मानक रूप में लिखे जाने के कारण ही हिंदी भाषा के साथ भारत की बहुत सी भाषाओं या बोलियों का अपनेपन वाला संबंध स्थापित नहीं हो पाता है। क्योंकि बागड़ी में चाँद को सांद कहते हैं। गरासिया में सौ को हो कहते हैं। इसी तरीके से अवधी, भोजपुरी और उत्तराखंड में बोली जाने वाली पहाड़ी भाषाओं के साथ भी हिंदी घुलने-मिलने की बजाय एक अलग रूप में अपनी मौजूदगी बनाये रखने की कोशिश करती है। इसको बहुत से भाषाविद सही नहीं मानते हैं तो हिंदी वाले मानक हिंदी के बचाव में अपने तर्क पेश करते हैं कि लिखित भाषा की एकरूपता बनाये रखने के लिए ऐसा करना जरूरी है।
हिंदी जैसी बोली जाती है वाली बात में भी बहुत से जगहों पर उच्चारण की स्पष्टता का अभाव भी ग़लत लिखे जाने या लिखे हुए को ग़लत समझने की ज़मीन तैयार करता है। अगर वास्तव में बात करें कि मात्राओं की ग़लती को कैसे सुधारा जा सकता है तो बेहतर होगा कि एक बार फिर से मात्राओं पर ग़ौर किया जाये। स्वरों की मात्राओं के प्रतीकों को समझने का प्रयास किया जाये। और किसी वर्ण में उसके लगने के बाद आवाज़ में होने वाले बदलाव को समझा जाये। और उसी के अनुसार अपने लिखे हुए को एक बार सरसरी निगाह से देखा जाये।
मात्राओं की ग़लती कम करने में मददगार है पढ़ना
मात्राओं की ग़लतियों को कम करने में सबसे ज्यादा मदद ऐसी पत्र-पत्रिकाओं और लेखों को पढ़ने से मिल सकती है तो अच्छी हिंदी में लिखे जाते हैं। यानी जिनमें हिंदी भाषा के वर्तनी और व्याकरण संबंधी ग़लतियां कम होती है। अपने लिखे हुए को दो-तीन बार पढ़ना। किसी और से पढ़वाकर देख लेना मात्राओं की ग़लतियों को पहचानने और उसे सुधारने में मदद करता है। हालांकि वास्तविकता तो यही है कि विचारों को मात्राओं वाली ग़लती से ज्यादा महत्व दिया जाता है। अगर आपका लेखन गुणवत्ता के मामले में बेहतर है तो मात्राओं वाली ग़लती को बहुत आसानी से सुधारा जा सकता है।
मगर राइटिंग के अभाव में तो क्या सुधारना और किसलिए सुधारना वाली बात ही नज़र आती है। इसलिए हमारा ध्यान लेखन के ऊपर होना चाहिए और अपने लिखे तो एक-दो बार पढ़ने से बुनियादी चीज़ें समझ में आ जाती है। इसके साथ-साथ पढ़ने के माध्यम से अपनी मात्राओं वाली ग़लतियों को प्रभावशाली ढंग से सुधारा जा सकता है। इस पोस्ट में फिलहाल इतना ही। अगली पोस्ट में मिलते हैं, इसी विषय के माइक्रो या विशिष्ट पहलुओं पर पर चर्चा के साथ।
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हिंदी भाषा में मात्राओं को पढ़ना-लिखना कैसे सिखाएं?
पहली-दूसरी कक्षा को पढ़ाने वाले शिक्षक अक्सर कहते हैं, “बच्चों को वर्ण तो सिखाना आसान है। मगर मात्राओं को लगाने के बाद वर्णों को पढ़ना-लिखना कैसे सिखाएं, यह बात समझ में नहीं आती।”
कुछ शिक्षकों ने इस सवाल का समाधान बारहखड़ी में खोजा। मगर बच्चों के लिए पूरी बारहखड़ी को रटना और बार-बार दोहराना बेहद उबाऊ होता है। इससे वे किसी लिखित सामग्री को अटक-अटक कर पढ़ते हैं, जिसमें उनकी काफी ऊर्जा जाया होती है। धारा प्रवाह पठन में भी बारहखड़ी सीखना बाधक बन जाता है।
बारहखड़ी है ‘कठिन’
बारहखड़ी की व्यावहारिक समस्या के बारे में एक शिक्षक बताते हैं, “बच्चे पढ़ने के लिए दौरान बारहखड़ी को पहाड़े की तरह याद करते हैं कि किसी वर्ण को एक क्रम कैसे पढ़ा जाये, जिसके साथ कोई मात्रा लगी है।”
भाषा कालांश के अपने अनुभवों में भी मैंने इस बात को देखा है कि जो बच्चे बारहखड़ी के माध्यम से किसी लिखित सामग्री को पढ़ने की कोशिश करते हैं, उनकी रफ्तार बाकी बच्चों से कम होती है जो मात्रा को समझकर पढ़ते हैं। एक बच्चे को प्रवाह के साथ किताब पढ़ने वाली स्थिति तक पहुंचने के लिए कई महीनों जूझना पड़ा। इसके लिए पुस्तकालय की किताबों से काफी मदद मिली। अगर इस तरह का सपोर्ट नहीं होता तो बच्चे के लिए अटक-अटक कर पढ़ने वाली स्थिति से बाहर निकलना काफी मुश्किल हो जाता।
दूसरी बात कि कुछ स्कूलों में मात्रा सिखाने का तरीकाभी समस्याओं से ग्रस्त है, जिससे निजात पाने की जरूरत है। ताकि बच्चों को एक बोझिल कवायद से बचाया जा सके। जैसे किताब पढ़ने के लिए क, क पर बड़ी ई की मात्रा की, त, त पर आ की मात्रा ता, ब किताब। इस तरीके से किसी पाठ को पूरे प्रवाह और सहजता के साथ पढ़ने में बच्चों को दिक्कत होती है। लंबे-लंबे वाक्यों को पढ़ना तो बहुत परेशान करने वाला होता है।
वर्णों की पहचान है जरूरी
मात्रा सिखाते समय ध्यान रखने वाली सबसे जरूरी बात है, “नई मात्रा ऐसे वर्णों के साथ सिखाएं जिसे बच्चे पहले से जानते हों यह भी ध्यान रखें कि जो मात्रा हम सिखाना चाहते हैं उसके वर्ण प्रतीक और मात्रा प्रतीक को बच्चे पहचानते हों, साथ ही उनकी आवाज़ों को भी जानते हों।”मात्रा सीखना पूरी तरह से सही और नियमित अभ्यास का मामला है। ऐसे में जरूरी है कि नई मात्रा सिखाने के बाद दो-तीन दिन तक लगातार उसके अभ्यास और दोहरान का मौका बच्चों को मिले।
इस दौरान शिक्षक को हर बच्चे तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। ताकि उनको पता चल सके कि कोन से बच्चे मात्राओं को अच्छी तरह पकड़ रहे हैं और किन बच्चों को कहां पर दिक्कत हो रही है? इससे उन बच्चों को आगे सपोर्ट करना शिक्षक के लिए काफी आसान हो जाएगा।
एक दिन में एक ही मात्रा सिखाएं
एक उदाहरण के माध्यम से बात करते हैं। किसी स्कूल में पहली कक्षा के बच्चों ने ‘ई’ की मात्रा सीखी। अगर इसी दिन ‘ऐ’ और’औ’ की मात्राओं के बारे में भी बच्चों को बताया जाये तो क्या होगा? इस बात की ज्यादा संभावना है कि बच्चों ने जो नई मात्रा सीखी है उसके अभ्यास का कम मौका मिलेगा। नई लर्निंग को समझ का हिस्सा बनने के लिए अभ्यास का जो अवसर बच्चों को मिलना चाहिए, वह शायद नहीं मिल पाएगा।
इसके बाद ऐसे शब्दों को पढ़ने का अवसर दिया जाये जो उन्हीं मात्राओं से बने हों जिसे बच्चों ने सीखा है। इससे बच्चे अंततः मात्राओं के लगने के बाद वर्णों की आवाज़ में होने वाले परिवर्तन को साफ़-साफ़ पहचान पाते हैं, बोलकर बता पाते हैं और अगर लिखने का भी मौका दिया जाये तो अच्छा श्रुतलेख भी लिख सकते हैं।
किसी संप्रत्यय को सीखने की प्रक्रिया बच्चे को आगे भी मदद करती है। इसलिए शुरुआत से पूरी प्रक्रिया को जितने अच्छे से बच्चों के सामने स्पष्ट करेंगे, अगली मात्रा सीखने में उसे उतना ही कम समय लगेगा और बच्चा तेजी से मात्राओं को कांसेप्ट को समझते हुए पढ़ना सीखने की दिशा में आगे बढ़ जाएगा।
इसलिए सिखाने की सही रणनीति होगी कि बच्चों को एक या दो दिन में एक ही मात्रा सिखाई जाए और बाकी मात्राओं के दोहरान का मौका शब्दों को पढ़ने के अभ्यास से दें। अगर बच्चे शब्द पठन में खुद को सहज महसूस कर रहे हैं तो यह अभ्यास बच्चों को काफी मदद करेगा।
आवाज़ में होने वाले बदलाव को स्पष्ट करें
किसी वर्ण के साथ मात्रा लगने पर उसकी आवाज़ में बदलाव होता है, अगर इस बात को समझने का मौका बच्चों को मिले तो वे बहुत आसानी से मात्राओं के कांसेप्ट को समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए इसके लिए जिन वर्णों को बच्चे पहले से जान रहे थे, उसमें ‘ई’ की मात्रा लगाने के बाद बच्चों को पढ़कर बताया कि उसकी आवाज़ कैसे बदल रही है। (जैसे क+ी=की, र+ ी= री)। इसके बाद वर्णों और मात्रा लगे वर्णों को लिखना शुरु किया, इसके जरिए बच्चों को यह बताना था कि कौन सा वर्ण लिखा जा रहा है। या मात्रा लगे वर्णों को पढ़कर बताने का मौका बच्चों को मिले।
एक स्कूल में भाषा के कालांश के दौरान सीवी (की, के, को इत्यादि) व वर्णों (क, ख, ग इत्यादि) के पठन वाली गतिविधि में बच्चों के ‘सेल्फ करेक्शन’ वाले पहलू को देखने का मौका मिला। बच्चे अगर किसी सीवी को गलत पढ़ रहे थे तो उसमें तेज़ी से खुद सुधार भी कर रहे थे। कई बार यह सुधार बाकी बच्चों को देखकर भी हो रहा था। इससे उन्हें मात्राओं की समझ के साथ किसी सीवी को पढ़ने का मौका मिल रहा था।
एक बात दिखी कि इस दौरान जो बच्चे बहुत छोटे थे, उनके लिए ध्यान देना संभव नहीं था। भाषा कालांश के बाद शिक्षक से उनके बारे में बात हुई कि इन बच्चों को आगे बैठाया जाये या फिर इनको बोर्ड पर किसी अन्य बच्चे के साथ पढ़ने के लिए बुलाया जाए। इसके बाद जब वह बच्चा खुद से पढ़ने का आत्मविश्वास हासिल कर ले तो उसे अकेले पढ़ने के लिए बुलाया जा सकता है।
आखिर में कह सकते हैं कि अगर इस तरीके से मात्राओं पर काम हो तो निश्चित तौर पर बच्चे सीखते हैं। उनका इस तरीके से सीखना बारहखड़ी वाले तरीके से ज्यादा कारगर और उपयोगी होता है जो समझ के साथ पढ़ने में मदद करता है।आ
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हिंदी लिखते समय मात्राओं की ग़लती से कैसे बचें? 10 टिप्स।

भाषा शिक्षण के लिए दीवारों पर बना एक चित्र।
हिंदी एक ऐसी भाषा है जिसमें किसी अक्षर या वर्ण के चारों तरफ मात्राएं लगती है। किसी वर्ण के ऊपर लगने वाली मात्रा को बच्चे ‘उपली मात्रा’ कहते हैं। वहीं किसी वर्ण के नीचे लगने वाली मात्रा को बच्चे ‘निचली मात्रा’ कहते हैं।
इसी तरीके से किसी वर्ण के पहले लगने वाली मात्रा को ‘छोटी मात्रा’ और पीछे लगने वाली मात्रा को ‘बड़ी मात्रा’ कहते हैं, जिसे आवाज़ों के अंतर द्वारा स्पष्ट करके बच्चों को पढ़ना सिखाया जाता है। इसी तरीके से कुछ मात्राएं वर्णों के बीच में भी लगती हैं। जैसे क्रिया, रूपक इत्यादि।
अगर हम बच्चों से बात करें तो पहली-दूसरी कक्षा के बच्चे और उनको पढ़ाने वाले शिक्षक बच्चों के बारे में बताते हैं कि किस बच्चे को कैसी मात्राएं पढ़ने में दिक्कत हो रही है। बच्चे पढ़ते-पढ़ते बहुत सी मात्राएं सीख लेते हैं, जो शिक्षक ने नहीं सिखाई होती हैं। जैसे रूकना या रूपया जैसे शब्द में उ की मात्रा को बच्चे आसानी से पढ़ पाते हैं।
अगर हम सामान्य तौर पर हिंदी लिखते समय होने वाली गलतियों की बात करें तो अमूमन हम अपने लिखे तो दोबारा नहीं पढ़ते। इस कारण से होने वाली गलतियां हमारी आदत का हिस्सा बन जाती हैं। इस कारण से हम उनको देखकर भी अनदेखा कर जाते हैं। इससे बचने के लिए इन दस बातों का ध्यान रख सकते हैं
10 टिप्स
1.बोल-बोल कर लिखने की कोशिश करें
2. अपना लिखा किसी और को पढ़ने के लिए दें
3. लिखित सामग्री को ग़ौर से पढ़ने की आदतडालें
4. अपने लिखे को दोबारा पढ़ें
5. अगर किसी शब्द के बारे में कोई उलझन हो तो शब्दकोश की मदद लें या गूगल सर्च करें
6. शब्दकोश डॉट कॉम जैसे विकल्प का इस्तेमाल ऑनलाइन कर सकते हैं
7. मात्रा लगने से किसी वर्ण की ध्वनि में बदलाव होता है, लिखते समय इस बात का ध्यान रखें। लिखित सामग्री को पढ़कर आप पता लगा लेंगे
8. हिंदी भाषा में मात्राओं की ग़लती से बचने का सबसे सुंदर उपाय छोटे बच्चों को पढ़ाना है ताकि आप खुद भी उनकी परेशानी को समझ पाएंगे। अपने लिए भी समाधान खोज पाएंगे।
9. पहली-दूसरी कक्षा की हिंदी की किताबों को फिर से पढ़ सकते हैं। छोटे बच्चों के लिए सुलेख और श्रुतलेख वाले विकल्प से काफी मदद मिलती है।
10. आखिर में सीखने की कोई उम्र नहीं होती। मात्राओं की गलती पर ध्यान देना जरूरी है, मगर विचारों की स्पष्टता और कंटेंट को अनदेखा करना भी ठीक नहीं है। इसलिए व्याकरण के साथ-साथ कहने वाली बात के ऊपर भी ध्यान दें।
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12 comments:
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बहुत सुंदर सर आपकी बातों का ध्यान रखेंगे और कक्षा में प्रयोग करेंगे
Very Good sir
सुधार के लिए कड़ी मेहनत, उतम प्रयास
Nice
Thik hai lekin me sahamat nhi..
वास्तविक अनुभव नही है इस लेख में
Easy method to learn.Good idea!
Nice Method
हर विद्यालय का वास्तविक अनुभव अलग होता है और हर एक का समावेश संभव नही
यह एवर ग्रीन अनुभव है जो लगभग सभी विद्यालयों में होते है
कुछेक अलग होते है जो स्वभाविक है
गुरुजी कक्षा 1-5 तक हिंदी विषय के बेहतरीन टीएलएम हो तो मुझे भेजिए या आपके इस ब्लॉग पर डालिए
ताकि हम लोग बच्चो को इसके माध्यम लाभ पहुंचा सके
आपका बहुत बहुत आभार गुरुदेव, आपने इतनी मेहनत करके बच्चों के हित में सराहनीय कार्य किया
Nice sir ji
आप के बताये अनुसार सभी गुरु जन कार्य करेंगे तो हिन्दी भाषा के साथ बच्चों का भविष्य सुधर सकेगा।
तरीका बताने के लिए आप को साधुवाद।
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