राजस्थान जनजाति आन्दोलन
➤ राजस्थान में भीलों में जनजागृति लाने का श्रेय स्वामी दयानंद सरस्वती को है।
➤ स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना बम्बई में 10 अप्रैल 1875 को की।
➤ स्वामी दयानंद सरस्वती शुद्धि आंदोलन के प्रेणता थे।
➤ स्वामी दयानंद सरस्वती ने “वेदों की ओर लौटो” का नारा दिया।
➤ स्वामी दयानंद सरस्वती राजस्थान में तीन आयें।
1. 1865 में करौली में आए। यही पर पहली बार लोगों को 4 स्व शब्द दिये- स्वधर्म, स्वराज, स्वराष्ट्र, स्वभाषा।
2. 1883 में उदयपुर में आयें। यहीं पर उन्होंने परोपकारिणी सभा की स्थापना की। इसके प्रथम अध्यक्ष मेवाड़ महाराणा सज्जनसिंह थे।
3. 1883 में जोधपुर में आये। इस समय जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह द्वितीय थे और शाही नृत्यांगना नन्ही जान थी।
➤ स्वामी दयानंद सरस्वती की मृत्यु 1883 में अजमेर में हुई।
➤ स्वामी से प्रेरणा पाकर गुरू गोविंद गिरी ने भीलों में जनजागृति लाने का कार्य किया।
1) भगत आंदोलन –
➤ नेतृत्व – गुरू गोविंद गिरी
➤ जन्म – 1858 में बांसिया ग्राम (डुंगरपुर) में एक बंजारे के घर में
➤ कार्यक्षेत्र – मानगढ़ (बांसवाड़ा)
➤ गुरू गोविंद गिरी ने 1883 में सिरोही में “सम्प सभा” की स्थापना की।
➤ उद्देश्य –
1) भीलों को मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूक करना
2) भील समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर करना
➤ 7 दिसंबर, 1908 को सम्प सभा का प्रथम वार्षिक अधिवेशन मानगढ़ धाम में आयोजित हुआ।
➤ 7 दिसंबर, 1913 को भीलों का द्वितीय वार्षिक अधिवेशन मानगढ़ में आयोजित हुआ, जिस पर कर्नल शैटर्न के नेतृत्व में मेवाड़ भील कौर के सैनिकों ने गोलीबारी की, जिसमें लगभग 1500 भील मारे गए। इस घटना को मानगढ़ हत्याकांड कहते हैं। गुरू गोविंद गिरी को गिरफ्तार कर लिया गया।
➤ गुरू गोविंद गिरी ने अपना अंतिम समय कम्बोई (गुजरात) में व्यतित किया।
➤ “भूरटिया नी मानू रे नी मानू” गुरू गोविंद गिरी का गीत है, जो आज भी भील क्षेत्र में प्रचलित है।
2) एकी आंदोलन/भोमट भील आंदोलन (1921)-
➤ उद्देश्य : भीलों में एकता स्थापित करना
➤ प्रणेता – मोतीलाल तेजावत (आदिवासियों का मसीहा, भीलों का संत मावजी)
➤ जन्म : कोल्यारी गांव (उदयपुर)
➤ कार्यस्थल – मातृकुंडिया धाम (चितौड़गढ़)
➤ भीलों ने मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में यह आंदोलन मातृकुंडिया धाम (राश्मी तहसील, जिला चितौड़गढ़) से प्रारम्भ किया।
➤ मातृकुंडिया धाम- मेवाड़/ राजस्थान का हरिद्वार
➤ 7 मार्च 1922 को भीलों ने मोतीलाल तेजावत के नेतृत्व में अजमेर के नीमड़ा गांव में भील सभा का आयोजन किया। इस सभा पर मेवाड़ भील कौर के सैनिकों ने गोलीबारी की, जिसमें लगभग 1200 भील मारे गए। इसे नीमड़ा कांड कहते हैं।
➤ इस घटना के बाद आंदोलन हिंसक हो गया, तब गांधी जी के कहने पर मोतीलाल तेजावत ने अंग्रेजों के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।
3) मीणा आंदोलन –
➤ जयपुर में मीणा जनजाति के द्वारा चलाया गया।
➤ नेतृत्व- ठक्कर बापा
➤ कारण – अंग्रेजों द्वारा बनाए दो कानून
1) क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट, 1924
2) जयपुर राज्य जयराम पेशा कानून, 1930
➤ इन कानूनों के तहत प्रत्येक मीणा को पुलिस चौकी पर दैनिक हाजिरी देनी पड़ती थी।
➤ मीणाओं ने इसका विरोध करते हुए 1933 में मीणा क्षेत्रीय महासभा तथा अप्रैल 1944 में मीणा राज्य सुधार समिति (अध्यक्ष- पं. बंशीधर शर्मा) का गठन किया। परिणाम स्वरूप अंग्रेजों ने महिलाओं व बच्चों को दैनिक हाजिरी से मुक्त कर दिया।
➤ 28 अक्टूबर, 1946 को बागावास सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें सभी चौकीदार मीणाओ ने अपने चौकीदारी के पदों से इस्तीफा दें दिया तथा अपना यादगार मुक्ति दिवस मनाया।
➤ अंततः 1952 में भारत सरकार ने इन दोनों कानूनों को निरस्त कर दिया।
¶आदिवासी आन्दोलन
भील आन्दोलन
नेतृत्व – गोविन्द गिरि(गुरू)
गोविन्द गिरि का जन्म 1818 में बांसिभर ग्राम(डुंगरपुर) में जन्म होता है इसका कार्य क्षेत्र डुंगरपुर व बांसवाड़ा था।
इन्होंने एक आन्दोलन भगत आन्दोलन/भगत पथ चलाया। इसका उद्देश्य भीलों में राजनैतिक जागृति लाने व शोषण व अत्याचार से मुक्त करवाने एवम् सामाजिक कुरीतियों का दुर करने हेतु।
गोविन्द गिरि ने दयानन्द सरस्वती से प्रेरणा लेकर 1883 में सम्पसभा(सिरोही) की स्थापना की। सम्प सभा का प्रथम अधिवेशन मानगढ पहाड़ी(बांसवाड़ा) पर 1903 में आयोजित किया जाता है। 17 नवम्बर 1913 मानगढ़ पहाड़ी पर सम्प सभा का एक विशाल अधिवेशन हो रहा था और इस सभा पर मेवाड़-भील कोर ने अन्धाधुध गोलीबारी कि और 1500 भील मारे गये।
17 नवम्बर 2012 को मानगढ़ पहाड़ी पर शहीद स्मारक का निर्माण किया गया और इसका लोकार्पण मुख्यमंत्री अशोक महलोत ने किया।(100 वर्षों के पुरा होने पर )
अश्विन पूर्णिमा को प्रतिवर्ष मानगढ़ पहाड़ी पर भीलों के मेलों का आयोजन किया जाता है।
गोविन्द गिरी के जेल(10 वर्ष कारावास) मे जाने के बाद इसका नेतृत्व – मोतीलाल तेजावत करते है इसका जन्म 1886 में कोत्यारी ग्राम(उदयपुर) में ओसवाल(जैन) परिवार में हुआ।
मोतीलाल तेजावत को भीलों का मसीहा कहते है।
भील इन्हें बावसी के नाम से पुकारते है।
मोतीलाल तेजावत द्वारा एकी आन्दोलन चलाया गया। भोमट क्षेत्र में चलाने के कारण इसे भोमट आन्दोलन के नाम से भी जाना जाता है।
एकी आन्दोलन का प्राराम्भ 1921 में मातृकुण्डिया ग्राम(चित्तौड़गढ़) से हुआ।
इन्होंने भीलों का एक विशाल सम्मेल नीमड़ा(चित्तौड़गढ़) में 2 अप्रैल 1921 में आयोजित किया। और इनके सम्मेलन पर मेवाड़ भील कोर के सैनिकों द्वारा गोली बारी की और इसमें 1200 भील मारे जाते हैं।
इसको महात्मा गांधी ने जलियावाला बाग हत्याकाण्ड से भी भयानक बताया व इसे राजस्थान का दुसरा जलिया वाला बाग हत्याकाण्ड भी कहा जाता है।
मोतीलाल तेजावत भूमिगत रहकर नेतृत्व करते है।
1929 में महात्मा गांधी के परामर्श से आत्म समर्पण कर दिया। इन्हें 6 वर्ष के लिए जेल हो जाती है।
¶मीणा आन्दोलन
जो मीणा खेती करने वालों को जागीदार मीणा कहलाये और जो चोरी डकैती करते उन्हे चैकीदार मीणा कहलाये।
मीणा दो प्रकार के थे –
1. जागीदार 2. चैकीदार
जयपुर रियासत 1924 में चैकीदार मीणाओं पर पाबंदी के लिये क्रिमिनल ट्राईव एक्ट लाया गया।
1930 मे जयपुर रियासत ने इनके लिए जरायम पेशा कानून लाई। इसमें प्रत्येक व्यस्क मीणा(स्त्री-पुरूष) को नजदीकी पुलिस थाने में हाजरी लगानी पड़ती थी।
1930 में मीणा क्षेत्रिय महासभा का गठन प. बन्शीहार शर्मा ने किया और मीणाओं के आन्दोलन इसी संस्था के अनुसार चलाये गये।
1944 में नीम का थाना सीकर में मीणाओं का एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया जाता है जिसकी जैन मूनि भगन सागर महाराज द्वारा अध्यक्षता की जाति है।
1946 में आधुनिक जयपुर के निर्माता – मिर्जा इस्माईल(जयपुर के प्रधानमंत्री) जरामम पेशा कानून रद्द कर दिया।
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